Santosh Singh Raakh

संतोष सिंह राख़

एक मुट्ठी राख़

” एक मुट्ठी राख हूँ मैं, चन्द वासनाओं में जला भुना |

पतझड़ का शाख हूँ मैं तृष्णाओं के तृण में फला फुला |

स्वार्थ के रथ पे खूब चढ़ा, कभी फिसला कभी गिर पड़ा |

क्षितिज से लंबी हो मेरी बाहें, हसरत में कटे दिन हर शाम ढला | “

एक मुट्ठी राख़

संतोष सिंह राख़

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