Santosh Singh Raakh

संतोष सिंह राख़

संतोष सिंह राख़

लेखक

  • पहली पुस्तक
    • काव्य एक मुट्ठी राख़ 
  • दूसरी काव्य पुस्तक
    • चाक चुम्बन
काव्य लेखक

संतोष सिंह राख़

संतोष सिंह राख़ ने अपनी पहली पुस्तक काव्य एक मुट्ठी राख़ के पश्चात दूसरी काव्य पुस्तक चाक चुम्बन को प्रकाशित किया | आर्यावर्त, जिसे हम वर्तमान में भारतवर्ष के रूप में जानते हैं, के पाटलिपुत्र अर्थात पटना, बिहार के निवासी संतोष सिंह राख़ अपनी दूसरी कविता पुस्तक चाक चुम्बन जोरबा बुक्स द्वारा प्रकाशित, के साथ बाहर हैं | संतोष सिंह राख़ कहते हैं – आभारी हूँ, उन तमाम साहित्य ऋषियों का, जिनकी वैचारिक मधु बूँदों की संचित सरिता, स्याही का रूप ले, मेरी लेखनी से प्रस्फुटित हो, इन दो मधु कोषों का निर्माण कर सकी। आभारी हूँ, अंतत: पाठशाला के दिनों के अपने उन अनमोल शिक्षकों का, जिन्होंने क से कबूतर से लेकर अ से अरस्तू के दार्शनिक सिद्धांतों एवं ज्ञ से ज्ञान गंगा गीता के मार्मिक दृष्टांतों से मेरी पहचान कराई। बचपन में ही शरत और ओशो से की गईं साहित्यिक मुलाकातें, केन्द्रीय विद्यालय खगौल के प्रांगन में घटित कुछ बातें तथा मुकद्दर में समंदर की कोलंबसी रातें

स्कूल के पीछे स्थित कब्रिस्तान को चुपचाप एकाकी से अवलोकन करने का नशा, दोस्तों की शरारतों पर खुद को शहादत देने का उमंग या फिर शहीद चलचित्र में भगत सिंह का ‘रंग दे वसंती चोला’ गाते – झूमते फांसी पर चढ़ जाने का उल्लास | या फिर नौवीं कक्षा में ‘खूनी हस्ताक्षर’ कविता पाठ के दौरान भावुकतापूर्ण बीच में हीं माइक छोड़कर भाग जाने की घटना | शायद जीवन की यही वे मिश्रित चंद घटनाएं रही होंगी, जिसने एक संकोची बैक बेंचर को, न जाने कब कैसे विचारों के बोगनविलिया से झाड़, कविता के कैनवस पे ला पटका | वैसे तो कविता का लारवा ने तो पिउपा का रूप स्कूल के दिनों में हीं लेना शुरू कर दिया था। रही बात उसकी किशोरावस्था में पहुंचने की तो वह आठवीं आते आते बटरफ्लाई का रूप ले चुका था | परंतु उसमें अभी भी व्याकरण का छोंक लगना बाकि था। शायद नाना जी के द्वारा बिजली गुल के दौरान, हाथों से मुझे पंखा करते हुए सुनाई गई सैंकड़ों कहानियां या फिर माता जी का उपन्यास चुरा कर पढ़ने की मेरी अबोध व्यसन ने मुझे धीरे धीरे चिंतन प्रवण का रोगी बना डाला । मैं, संतोष सिंह राख़ काव्य की तपोभूमि का एक बेहद हीं निचले स्तर का उपासक हूं। एक अदना सा, नन्हा सा तुतलाता काव्य शिशु । प्रस्तुत काव्य पुस्तक चाक चुम्बन समाज व तंत्र के बीमारू व्यवस्था के ऊपर विवरणात्मक, भावात्मक एवम आलोचनात्मक कुठाराघात है । वास्तव में यह पंक्ति में खड़े हर उस आखिरी व्यक्ति की अभिव्यक्ति है, जिसे सिस्टम ने टिश्यू पेपर समझ अपनी नाक साफ कर उसे रिसाइकल होने तक के लिए नहीं छोड़ा । राख़ समर्पित है उस तंद्रित जन समूह से बने आधुनिक रोबोटिक समाज को, जिसने उसे चेतना दी, संवेदना दी, पीड़ा दिया, जगाया, भगाया और दबाया कि कुछ तो वमन कर | कबंधासुर की तरह जीवन जीना छोड़, आलस्य को पीना छोड़ | चाक चुम्बन उस दाब का प्रष्फ़ुटन है, उसी की अभिव्यक्ति है, जगत का, समाज रूपी जगदीश का | उम्मीद है चाक चुम्बन अग्नि से भरी म्यान साबित होगी। इसकी रचनाओं में प्रकट विचार बारूदों की बाहुल्यता और आने वाली नस्लों को अभिमन्यु बनाए जाने का फार्मूला है। माँ भारती से मेरी प्रार्थना है कि मेरे शाब्दिक बमों की गूंज, शहीदे – आज़म भगत सिंह के द्वारा सेंट्रल ऐसम्ब्ली में फेंके गए उन बमों के विस्फोट के समान गूँजे, जिससे कि इस देश में व्याप्त जातिगत द्वेष, मजहबी उन्माद तथा तथाकथित मौकापरस्त स्वार्थलोलुप तंत्र के ठेकेदारों की तंद्राएँ उड़ सके | उत्तिष्ठ भारत | जय हिन्द | ~~~ संतोष सिंह राख़ संतोष सिंह राख़ की कवितायें पहले से ही इसके गहरे अर्थ और शब्दों पर खेल के लिए बहुत अधिक प्रशंसा बटोर रही है। दोनों पुस्तकें Zorba Books, Amazon, Flipkart और सभी ऑनलाइन स्टोर पर प्रिंट रूप में और ebooks के रूप में भी उपलब्ध हैं ।

पुस्तकें

संतोष सिंह राख़

लेखक

संतोष सिंह राख़ द्वार रचित पुस्तक

एक मुट्ठी राख़

लेखक

संतोष सिंह राख़ द्वार रचित पुस्तक

चाक चुम्बन

कविता

संतोष सिंह राख़

संतोष सिंह राख़

एक मुट्ठी राख़

” एक मुट्ठी राख हूँ मैं, चन्द वासनाओं में जला भुना |

पतझड़ का शाख हूँ मैं तृष्णाओं के तृण में फला फुला |

स्वार्थ के रथ पे खूब चढ़ा, कभी फिसला कभी गिर पड़ा |

क्षितिज से लंबी हो मेरी बाहें, हसरत में कटे दिन हर शाम ढला | “

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